उत्तर प्रदेश में जनप्रतिनिधियों के सम्मान पर योगी सरकार का बड़ा आदेश: सांसद-विधायकों के सामने अधिकारियों को उठकर करना होगा अभिवा दन, विपक्ष ने उठाए सवाल.

 

उत्तर प्रदेश में जनप्रतिनिधियों के सम्मान पर योगी सरकार का बड़ा आदेश: सांसद-विधायकों के सामने अधिकारियों को उठकर करना होगा अभिवादन, विपक्ष ने उठाए सवाल

लखनऊ | 9 मई 2026

Yogi Adityanath के नेतृत्व वाली Government of Uttar Pradesh ने प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के संबंधों को लेकर एक बड़ा और सख्त निर्देश जारी किया है। 8 मई 2026 को जारी इस आदेश में साफ कहा गया है कि प्रदेश के सभी प्रशासनिक अधिकारी सांसदों और विधायकों का सम्मानपूर्वक अभिवादन करेंगे, उनके फोन कॉल का जवाब तुरंत देंगे और कार्यालय में आने पर उन्हें उचित सम्मान देंगे।

यह निर्देश उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव SP Goyal द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सभी जिलाधिकारियों (DM), मंडलायुक्तों और वरिष्ठ अधिकारियों को दिए गए। सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए जनप्रतिनिधियों का सम्मान सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। हालांकि इस आदेश को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस शुरू हो गई है।




क्या है योगी सरकार का नया आदेश?

मुख्य सचिव द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार:

  • जब भी कोई सांसद या विधायक किसी सरकारी कार्यालय में पहुंचे, अधिकारी अपनी कुर्सी से उठकर उनका अभिवादन करेंगे।

  • अधिकारियों को हाथ जोड़कर सम्मानपूर्वक स्वागत करने के लिए कहा गया है।

  • जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल को प्राथमिकता से उठाना अनिवार्य किया गया है।

  • यदि कोई अधिकारी मीटिंग में व्यस्त हो, तब भी उसे शिष्टाचार निभाते हुए जनप्रतिनिधि को बैठने के लिए कहना होगा।

  • किसी भी प्रकार की उपेक्षा या असम्मान की शिकायत मिलने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

  • आदेश का पालन प्रदेश के सभी जिलों में सख्ती से कराने को कहा गया है।

सरकार का मानना है कि कई जिलों से जनप्रतिनिधियों की शिकायतें मिल रही थीं कि अधिकारी उनके फोन नहीं उठाते, मिलने का समय नहीं देते और व्यवहार में उपेक्षा दिखाई जाती है। इसी को देखते हुए यह निर्णय लिया गया।


वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में क्या कहा गया?

सूत्रों के अनुसार, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान मुख्य सचिव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। उन्होंने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि सांसद और विधायक जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार होना चाहिए।

बैठक में यह भी कहा गया कि जनता से जुड़े विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और अधिकारियों को उनके सुझावों को गंभीरता से लेना चाहिए।


बीजेपी नेताओं ने फैसले का किया समर्थन

Bharatiya Janata Party के कई नेताओं ने इस आदेश का स्वागत किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह कोई “विशेष सम्मान” नहीं बल्कि लोकतांत्रिक शिष्टाचार का हिस्सा है।

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ताओं का कहना है:

“जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं। यदि अधिकारी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का सम्मान नहीं करेंगे, तो जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा?”

कुछ बीजेपी नेताओं ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में नौकरशाही का रवैया “अत्यधिक स्वतंत्र” हो गया था, जिसे संतुलित करने की आवश्यकता थी।


समाजवादी पार्टी ने क्या कहा?

Samajwadi Party ने इस आदेश पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार प्रशासन को “राजनीतिक दबाव” में काम करने के लिए मजबूर कर रही है।

एक वरिष्ठ सपा नेता ने बयान दिया:

“अधिकारी संविधान के अनुसार काम करते हैं, किसी राजनीतिक व्यक्ति के निजी कर्मचारी नहीं हैं। सम्मान जरूरी है, लेकिन आदेश के जरिए सम्मान नहीं कराया जा सकता।”

सपा ने यह भी आरोप लगाया कि इस प्रकार के आदेश से निष्पक्ष प्रशासन प्रभावित हो सकता है।


कांग्रेस की प्रतिक्रिया

Indian National Congress ने भी सरकार के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को “प्रोटोकॉल” और “संविधान” के अनुसार काम करना चाहिए।

कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा:

“यदि कोई अधिकारी जनता का काम नहीं करता तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन केवल नेताओं को खुश करने के लिए प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बनाना लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है।”


बहुजन समाज पार्टी की प्रतिक्रिया

Bahujan Samaj Party ने इस आदेश को “राजनीतिक संस्कृति का नया दबाव” बताया। पार्टी का कहना है कि प्रशासन को निष्पक्ष बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।

बीएसपी नेताओं ने कहा कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संतुलन बना रहना चाहिए, वरना प्रशासनिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।


आम आदमी पार्टी ने उठाए सवाल

Aam Aadmi Party के नेताओं ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि असली मुद्दा जनता की समस्याओं का समाधान है, न कि “औपचारिक अभिवादन”।

आप नेताओं ने कहा:

“यदि जनता के काम समय पर हों, भ्रष्टाचार कम हो और फोन आम नागरिकों के भी उठाए जाएं, तो लोकतंत्र मजबूत होगा।”


प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी चर्चा तेज

सरकारी हलकों में यह आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है। कई अधिकारियों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों के साथ शिष्टाचार पहले से प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन अब इसे औपचारिक निर्देश के रूप में लागू किया गया है।

कुछ अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से कहा कि फोन कॉल का तुरंत जवाब देना हर समय संभव नहीं होता, विशेषकर कानून-व्यवस्था और आपात स्थितियों में। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि “उपेक्षा” और “जानबूझकर अनदेखी” को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


क्या पहले भी ऐसे निर्देश दिए गए थे?

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में समय-समय पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के संबंधों को लेकर दिशा-निर्देश जारी होते रहे हैं। इससे पहले भी विभिन्न सरकारों ने अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों के साथ समन्वय बनाए रखने के लिए कहा था।

हालांकि इस बार निर्देशों की भाषा और “कुर्सी से उठकर अभिवादन” जैसे बिंदुओं ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।


राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रशासन और राजनीति के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार:

  • सरकार जनप्रतिनिधियों की शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहती है।

  • 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक स्तर पर संगठन और प्रशासन के बीच तालमेल मजबूत करने की रणनीति भी हो सकती है।

  • इससे स्थानीय स्तर पर विधायकों और सांसदों की “प्रभावशीलता” बढ़ सकती है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।


जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर इस आदेश को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

कुछ लोगों ने कहा कि:

  • जनप्रतिनिधियों का सम्मान होना चाहिए।

  • अधिकारी जनता और जनप्रतिनिधियों दोनों के प्रति जवाबदेह हैं।

  • कई जिलों में अफसरशाही का रवैया कठोर हो गया था।

वहीं दूसरी ओर कई यूजर्स ने सवाल उठाए कि:

  • क्या आम नागरिकों के फोन भी अधिकारी इसी तरह उठाएंगे?

  • क्या जनता को भी कार्यालयों में सम्मान मिलेगा?

  • क्या इससे राजनीतिक दबाव बढ़ेगा?


योगी सरकार का संदेश क्या है?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस आदेश के जरिए Yogi Adityanath सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को यह संदेश देना चाहती है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।

सरकार लगातार “सुशासन” और “जवाबदेही” पर जोर देती रही है। ऐसे में यह निर्देश प्रशासनिक व्यवहार को लेकर सरकार की प्राथमिकता को भी दर्शाता है।


आगे क्या हो सकता है?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह आदेश जमीन पर किस प्रकार लागू होगा। यदि किसी अधिकारी पर जनप्रतिनिधि के अपमान का आरोप लगता है, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी, इस पर भी निगाहें रहेंगी।

इसके साथ ही विपक्ष इस मुद्दे को आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बना सकता है। प्रशासनिक तंत्र, राजनीतिक नेतृत्व और जनता — तीनों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती रहेगा।


निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश सरकार का यह नया आदेश प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। सरकार इसे लोकतांत्रिक शिष्टाचार और जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने वाला कदम बता रहा है।

अब देखने वाली बात होगी कि यह आदेश अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के रिश्तों में बेहतर समन्वय लाता है या फिर नई राजनीतिक बहसों को जन्म देता है।