वंदे मातरम् के दो हिस्से’: अमित शाह ने नेहरू–इंदिरा विरासत पर साधा निशाना



**“‘वंदे मातरम् के दो हिस्से’: अमित शाह ने नेहरू–इंदिरा विरासत पर साधा निशाना, 150वीं वर्षगांठ पर संसद में टकराव तेज”— News Article (9 दिसंबर 2025)

भारत की संसद में सोमवार और मंगलवार का दिन अनोखा रहा, जहां वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर हुई विशेष चर्चा ने राजनीतिक माहौल को बेहद गर्म कर दिया।

यह news article केवल एक बहस नहीं बल्कि भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यात्रा पर गंभीर विमर्श जैसा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को राज्यसभा में चर्चा के दौरान पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर तीखे हमले किए, जिससे सदन में तनाव और आरोप-प्रत्यारोप का माहौल और बढ़ गया।


प्रस्तावना: वंदे मातरम् के 150 साल और राजनीति की नई जंग — News Article

इस news article की शुरुआत करते हुए यह समझना जरूरी है कि "वंदे मातरम्" केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा है। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की कलम से निकला यह गीत हर उस भारतीय के दिल में आज भी धड़कता है जो देशभक्ति के भाव को समझते हैं।
इसके 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में दो-दिवसीय विशेष चर्चा रखी गई, लेकिन यह article news जल्दी ही राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन गया।




अमित शाह का बड़ा बयान: ‘नेहरू ने वंदे मातरम् के दो टुकड़े किए’ — News Article

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि वर्ष 1937 में, जब "वंदे मातरम्" की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही थी, तब तत्कालीन कांग्रेस नेता और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू ने इसे “दो टुकड़ों में बांटने” का फैसला लिया।

अमित शाह ने अपने news article style बयान में कहा—

“जब वंदे मातरम् के पचास साल हुए, देश आज़ाद नहीं था। लेकिन 1937 में जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की राजनीति के तहत वंदे मातरम् को दो अंतरों तक सीमित कर दिया। यहीं से तुष्टिकरण की शुरुआत हुई।”

उनके इस बयान ने सदन में हंगामा मचा दिया। विपक्ष के कई सांसदों ने इसे “तथ्यों का राजनीतिकरण” बताया, जबकि सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने शाह के बयान का समर्थन किया।


तुष्टिकरण से विभाजन तक का आरोप — News Article

अमित शाह ने आगे कहा कि यदि "वंदे मातरम्" को सीमित न किया गया होता, तो शायद भारत का विभाजन उस रूप में न होता जैसा इतिहास ने देखा।

उन्होंने इस political news article के अंदाज़ में कहा—

“पचासवें पड़ाव पर वंदे मातरम् को सीमित कर दिया गया। वहीं से तुष्टिकरण की शुरुआत हुई और वही आगे चलकर देश के विभाजन में बदली।”

यह बयान अपने आप में बेहद विस्फोटक था क्योंकि इससे सीधे तौर पर कांग्रेस नेतृत्व पर ऐतिहासिक आरोप लगाए गए।


इंदिरा गांधी पर भी हमला: ‘वंदे मातरम् बोलने वालों को जेल भेजा’ — News Article

अमित शाह ने बिना रुके पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि 1975 के आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने "वंदे मातरम्" बोलने वालों तक को जेल भेज दिया।

उनके शब्द इस news article के सबसे तीखे हिस्सों में से एक थे—

“जब यह गीत 100 साल का हुआ, तब आपातकाल लगाया गया। इंदिरा जी ने ‘वंदे मातरम्’ बोलने वालों को जेल में डाला, विपक्ष को बंदी बनाकर देश को कैद कर लिया गया।”

सत्ता और विपक्ष के बीच यह मुद्दा तुरंत टकराव में बदल गया और सदन में कई बार नारेबाज़ी तक सुनाई दी।


पीएम मोदी की टिप्पणी और लोकसभा में माहौल — News Article

एक दिन पहले लोकसभा में भी यह मुद्दा सुर्खियों में रहा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने भी नेहरू और इंदिरा गांधी की नीतियों की आलोचना की और कहा कि “वंदे मातरम्” को कांग्रेस ने वैचारिक राजनीति में फंसा दिया।

यह पूरा प्रसंग इस news article को और भी तीखा बना देता है क्योंकि यह केवल ऐतिहासिक बहस नहीं बल्कि वर्तमान राजनीति की ध्रुवीकरण को भी दर्शाता है।


कांग्रेस का जवाब: प्रियंका गांधी ने किया नेहरू का बचाव — News Article

कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री और अमित शाह की टिप्पणियों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में नेहरू ने वंदे मातरम् को कभी कमजोर नहीं किया, बल्कि इसे राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाया।

इस article news का यह हिस्सा राजनीतिक टकराव को नई गति देता है।
प्रियंका गांधी ने कहा—

“जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी, उन्हीं पर राष्ट्रभक्ति की कसौटी पर सवाल उठाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”


ओवैसी का बयान भी आया चर्चा में — News Article

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नागरिक से “वफादारी का सर्टिफिकेट” नहीं मांगा जाना चाहिए।
उनका कहना था—

“देशभक्ति किसी गीत को बोलने या न बोलने से तय नहीं होती।”

उनकी राय ने इस आर्टिकल में एक नया कोण जोड़ दिया—धर्म, पहचान और राष्ट्रवाद की बहस।


सरकार का दावा: ‘हम किसी भी मुद्दे पर चर्चा से नहीं डरते’ — News Article

अमित शाह ने विपक्ष के आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि सरकार हमेशा चर्चा से भागने का आरोप झेलती है, लेकिन यह सरासर गलत है।

उन्होंने कहा—

“संसद का बहिष्कार हम नहीं करते। कोई भी मुद्दा हो हम चर्चा के लिए तैयार हैं।”

यह बयान इस news article के राजनीतिक माहौल को और स्पष्ट करता है—सरकार विपक्ष को “भागने वाला”, और विपक्ष सरकार को “भटकाने वाला” बता रहा है।


ऐतिहासिक संदर्भ: वंदे मातरम् क्यों बना विवाद का केंद्र? — News Article

हालांकि यह article news राजनीति पर आधारित है, लेकिन इसका सांस्कृतिक पहलू समझना भी जरूरी है।

  • “वंदे मातरम्” बंगाल के विभाजन के दौरान राष्ट्रीय प्रतिरोध का गीत बना।

  • इसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हजारों लोगों ने गाया, जेलों में, जुलूसों में, सभाओं में।

  • लेकिन 1937 के बाद इसके पूरे गीत को राष्ट्रीय गीत बनाने पर धार्मिक आपत्तियाँ उठीं।

  • इसी विवाद से गीत को दो हिस्सों में बांटने का निर्णय लिया गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इस news article को अधिक संतुलित बनाती है।


राज्यसभा का माहौल: टकराव बनाम संवाद — News Article

राज्यसभा में चर्चा के दौरान कई पल ऐसे आए जब विपक्ष ने बीच में टोकाटोकी की, जबकि सभापति को सदन को शांत रखना पड़ा।
समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष अपने-अपने ऐतिहासिक तर्क पेश करते रहे।

सदन में यह वातावरण इस article news का वह हिस्सा है जहां लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर दिखती है—बहस, संघर्ष और शब्दों का टकराव।


सवाल बड़े हैं, जवाब आज भी तलाश में — News Article

  • क्या 1937 का निर्णय राजनीतिक था या व्यावहारिक?

  • क्या तुष्टिकरण की राजनीति ने इतिहास को मोड़ा?

  • क्या आपातकाल के दौरान वंदे मातरम् से जुड़ी घटनाएँ आज फिर चर्चा में आनी चाहिए?

ये वे प्रश्न हैं जिन्हें यह news article उठाता है, लेकिन उनके जवाब आज भी बहस का विषय हैं।


जनता की प्रतिक्रिया: सोशल मीडिया पर तूफान — News Article

सोशल मीडिया पर #VandeMataram150 और #AmitShah ट्रेंड कर रहा है।
कुछ लोग शाह के बयान को “साहसिक” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “ऐतिहासिक गलती का राजनीतिक उपयोग” कह रहे हैं।
यह article news डिजिटल इंडिया की उस पहचान को दर्शाता है जहां राजनीति अब केवल संसद तक सीमित नहीं।


निष्कर्ष: 150 साल बाद भी वंदे मातरम् राजनीति के केंद्र में — News Article

इस 3000-शब्दों के news article की समाप्ति पर यही कहा जा सकता है कि “वंदे मातरम्” भारत की आत्मा है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द राजनीति आज भी उतनी ही प्रखर है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के समय।

150 साल बाद भी यह गीत न सिर्फ देशभक्ति का प्रतीक है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में विचारों के टकराव का भी केंद्र है।
अमित शाह के बयान ने इस राजनीतिक बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा 2025 की राजनीति का प्रमुख विषय बना रहेगा।