संभल से सियासी-संत संदेश: अखाड़ा परिषद का शंकराचार्य के ‘लखनऊ कूच’ से किनारा, योगी सरकार को खुला समर्थन
20 February 2026 | संभल/लखनऊ | विशेष विस्तृत रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजनीति और संत समाज के बीच उभरा ताज़ा विवाद अब केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राज्य की धार्मिक-राजनीतिक धुरी पर गहरा असर डालने वाला मुद्दा बन गया है। 20 फरवरी 2026 को संभल में आयोजित कल्कि महोत्सव के मंच से अखाड़ा परिषद ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के प्रस्तावित ‘लखनऊ कूच’ पर तीखी प्रतिक्रिया दी और साफ संकेत दिया कि परिषद सरकार के साथ खड़ी है, न कि आंदोलन की राह पर।
अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवींद्र पुरी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि “दबाव की राजनीति संत परंपरा के अनुरूप नहीं है” और परिषद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यप्रणाली पर भरोसा रखती है।
यह बयान उस समय आया जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 11 मार्च को लखनऊ कूच का ऐलान किया है, जिसे वे बटुकों के सम्मान और गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग से जोड़कर देख रहे हैं।
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योगी सरकार को खुला समर्थन |
विवाद की पृष्ठभूमि: कहाँ से शुरू हुआ टकराव?
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत कथित तौर पर बटुकों के अपमान के मुद्दे से हुई। कुछ धार्मिक आयोजनों में पारंपरिक वेषभूषा और शिखा से जुड़े युवाओं के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आईं। संत समाज के एक वर्ग ने इसे सनातन परंपराओं का अपमान बताया।
इस पर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने सख्त रुख अपनाते हुए इसे “महापाप” कहा और दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया।
हालांकि, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यापक वैचारिक समस्या के रूप में प्रस्तुत किया और आंदोलन की घोषणा कर दी।
संभल के मंच से स्पष्ट संदेश
कल्कि महोत्सव के स्थापना दिवस पर बोलते हुए रवींद्र पुरी ने कहा:
“जब सरकार जांच और कार्रवाई का भरोसा दे रही है, तब आंदोलन का औचित्य समझ से परे है। संत समाज संवाद से समाधान चाहता है, टकराव से नहीं।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अखाड़ा परिषद के अंतर्गत आने वाले अधिकांश अखाड़े और बड़े संत किसी भी तरह से ‘लखनऊ कूच’ के समर्थन में नहीं हैं।
उनके शब्दों में, “सनातन की रक्षा का मार्ग संयम और संवाद है, दादागिरी नहीं।”
‘असली या नकली हिंदू’ बयान से बढ़ा विवाद
विवाद उस समय और तीखा हो गया जब शंकराचार्य की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में ‘असली या नकली हिंदू’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की चर्चा सामने आई।
अखाड़ा परिषद ने इस बयान को मर्यादा के विरुद्ध बताया। रवींद्र पुरी ने कहा कि मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस तरह की टिप्पणी करना संत परंपरा के अनुरूप नहीं है।
यह बयान राजनीतिक गलियारों में भी गूंजा और विपक्ष ने इसे सत्ताधारी दल और संत समाज के बीच मतभेद के संकेत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।
आचार्य प्रमोद कृष्णम की प्रतिक्रिया
कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले दस वर्षों से विरोध और दबाव का सामना करते रहे हैं और किसी भी प्रकार की धमकी या कूच से भयभीत नहीं होंगे।
उन्होंने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा:
“जितना कूच करेंगे, उतनी बढ़ेगी पूंछ।”
उनका आशय यह था कि आंदोलन से मुख्यमंत्री की राजनीतिक स्थिति कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत होगी।
संत समाज में अंतर्विरोध या वैचारिक बहस?
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत बयानबाज़ी नहीं है। इसके पीछे संत समाज के भीतर चल रही वैचारिक बहस भी हो सकती है।
एक धड़ा मानता है कि सरकार के साथ मिलकर चरणबद्ध तरीके से मांगें पूरी कराई जाएं।
दूसरा धड़ा यह मानता है कि सार्वजनिक दबाव और जनांदोलन के बिना बड़े निर्णय संभव नहीं हैं।
अखाड़ा परिषद का झुकाव स्पष्ट रूप से पहले विकल्प की ओर दिखाई दे रहा है।
गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग
इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग भी है। संत समाज का एक वर्ग इसे सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखता है।
रवींद्र पुरी ने कहा कि इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकार से वार्ता जारी है। उनका कहना है कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत उचित समय पर निर्णय लिया जा सकता है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि “माहौल खराब करके कोई निर्णय जल्दी नहीं होता।”
राजनीतिक प्रभाव: 2026 की सियासत पर असर?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक मुद्दों का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
यदि संत समाज में विभाजन की धारणा बनती है, तो विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है।
यदि अखाड़ा परिषद और अन्य बड़े धार्मिक संगठन सरकार के साथ रहते हैं, तो सत्ताधारी दल को लाभ मिल सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों में यह विवाद भाजपा के लिए चुनौती से ज्यादा अवसर भी बन सकता है, क्योंकि सार्वजनिक समर्थन की तस्वीर मजबूत दिखाई जा रही है।
विपक्ष की भूमिका
हालांकि विपक्ष ने अब तक औपचारिक बड़ा बयान नहीं दिया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस विवाद को “धर्म बनाम सत्ता” के रूप में पेश करने की रणनीति बनाई जा सकती है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा और संसद तक पहुंच सकता है।
11 मार्च: अगली बड़ी परीक्षा
अब सबकी निगाहें 11 मार्च पर टिकी हैं। यदि शंकराचार्य का लखनऊ कूच होता है, तो यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाएगा।
संभावनाएँ कई हैं:
सरकार और संत समाज के बीच वार्ता से समाधान निकल आए।
आंदोलन सीमित दायरे में रह जाए।
यह मुद्दा राज्यव्यापी बहस का रूप ले ले।
संत परंपरा और लोकतांत्रिक संवाद
भारतीय समाज में संतों की भूमिका केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मार्गदर्शक की रही है। ऐसे में संत समाज के भीतर मतभेद सार्वजनिक होने से व्यापक संदेश जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार है, लेकिन संवाद और संयम से समाधान अधिक स्थायी होते हैं।
निष्कर्ष: टकराव या संवाद?
20 फरवरी 2026 का दिन इस विवाद में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। संभल से आया संदेश स्पष्ट था — अखाड़ा परिषद सरकार के साथ है और टकराव की राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहती है।
अब देखना यह है कि 11 मार्च का प्रस्तावित कूच वास्तव में होता है या संवाद के रास्ते से समाधान निकलता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म और सत्ता का समीकरण हमेशा संवेदनशील रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस विवाद की दिशा न केवल संत समाज बल्कि राज्य की सियासत को भी प्रभावित कर सकती है।
(यह लेख 20 February 2026 की उपलब्ध ताज़ा सूचनाओं और सार्वजनिक बयानों पर आधारित स्वतंत्र, विस्तृत और मौलिक समाचार प्रस्तुति है।)
