किसानों को दीपावली पर नहीं मिला बोनस सम्मान निधि, सरकार के फैसले से नाराज किसान | 25 अक्टूबर 2025 की बड़ी खबर
भारत में दीपावली का पर्व खुशियों, समृद्धि और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। इस त्यौहारी मौसम में हर नागरिक यह उम्मीद करता है कि उसकी आय और जीवन स्तर में सुधार हो और सरकार भी विशेष समर्थन प्रदान करे। हालांकि इस वर्ष का दीपावली सीजन देश के करोड़ों किसानों के लिए निराशा लेकर आया है, क्योंकि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत किसी भी प्रकार के बोनस भुगतान की घोषणा नहीं की गई है।
इसके उलट, राज्य और केंद्र सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए बोनस और वेतन वृद्धि से संबंधित कई घोषणाएँ की हैं, जिससे किसानों में असंतोष तेजी से फैल रहा है। किसान संगठन इस निर्णय को दोहरे मापदंड का उदाहरण बताते हुए आलोचना कर रहे हैं और इसे किसानों के साथ अन्याय कह रहे हैं।
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किसानों की नाराजगी: खेती छोड़ सरकारी नौकरी करो क्या?
किसान नेताओं का कहना है कि देश का अन्नदाता आज कठिन परिस्थितियों में है।
“अगर एक तरफ सरकारी कर्मचारियों को दीपावली बोनस और भत्ते मिल रहे हैं और दूसरी तरफ खेती करने वाले किसानों को त्योहारी समर्थन भी नहीं मिल पा रहा है, तो यह स्पष्ट भेदभाव दर्शाता है।”
किसान यह तर्क दे रहे हैं कि खेती ही देश की रीढ़ है, और त्योहारी सीजन में कृषि कार्य और खर्च बढ़ जाते हैं। ऐसे में यदि सरकार किसानों की आर्थिक सहायता नहीं करेगी, तो खेतों में उत्पादन पर भी असर पड़ेगा।
कई किसानों का यह भी कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि सरकार किसान सम्मान निधि के अंतर्गत प्रति वर्ष मिलने वाली ₹6,000 की तीन किस्तों के अतिरिक्त एक त्योहारी बोनस या विशेष किस्त जारी करेगी। विशेषकर वर्ष 2025 में लगातार बढ़ती कृषि लागत, महंगाई और मौसम की मार को देखते हुए किसानों की उम्मीद और अधिक थी।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) केंद्र सरकार की एक अति महत्वपूर्ण योजना है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक पात्र किसान परिवार को प्रति वर्ष ₹6,000 की आर्थिक सहायता सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है।
इस योजना का उद्देश्य किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना और खेती से जुड़े तत्काल आवश्यक खर्चों में सहायता प्रदान करना है।
हालांकि किसान यह मानते हैं कि यह राशि अब पर्याप्त नहीं रही। उनका कहना है कि खाद, बीज, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली और मजदूरी का खर्च पिछले कुछ वर्षों में दोगुना से अधिक बढ़ चुका है।
किसानों की मांग है कि इस राशि को कम से कम ₹12,000 या ₹18,000 प्रति वर्ष तक बढ़ाया जाए और दीपावली जैसे प्रमुख त्यौहारों पर एक विशेष बोनस दिया जाए, ताकि वे सम्मान और खुशी के साथ अपने परिवार का त्यौहार मना सकें।
सरकारी कर्मचारियों को लाभ, किसान हुए नाराज
हाल ही में कई राज्य सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए बोनस, महंगाई भत्ता (DA), और वेतन वृद्धि जैसे लाभों की घोषणा की है।
किसान सवाल उठा रहे हैं कि:
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जब देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान कृषि क्षेत्र का है
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जब खेतीदेश के खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है
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जब किसान दिन-रात मेहनत कर उत्पादन बढ़ाते हैं
तब किसानों को ही नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?
किसान संगठनों का कहना है कि एक सरकारी कर्मचारी को औसतन हर त्यौहार पर बोनस मिलता है, जबकि किसान परिवार को अपने त्यौहार के लिए कर्ज लेना पड़ता है। यह स्थिति समावेशी आर्थिक नीतियों के विपरीत है।
त्योहारी सीजन में खेती का काम चरम पर
यह समय खरीफ फसल की कटाई और रबी फसल की बुवाई का है।
किसानों के अनुसार,
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कटाई के लिए मशीनरी
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मजदूरी
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डीज़ल और बिजली की लागत
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बीज और खाद की खरीद
जैसे अनेक बड़े खर्च इसी समय होते हैं।
यदि आर्थिक समर्थन समय पर नहीं मिले, तो किसान न केवल त्यौहार खराब महसूस करते हैं, बल्कि उनकी फसल चक्र में भी व्यवधान आता है।
किसानों की मांगें क्या हैं?
किसान संगठनों ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
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दीपावली बोनस के रूप में कम-से-कम ₹4,000 की विशेष किस्त जारी की जाए
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किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाई जाए
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खेती के इनपुट खर्चों पर सब्सिडी में वृद्धि हो
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मौसम आपदा से प्रभावित क्षेत्रों को तुरंत राहत मिले
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कृषि ऋण पर ब्याज दर कम की जाए
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न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी लागू की जाए
यदि सरकार इन मांगों पर ध्यान नहीं देती, तो किसान आंदोलन तेज करने की चेतावनी भी दे रहे हैं।
किसानों की आवाज: जमीनी स्तर की प्रतिक्रियाएँ
विभिन्न राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के किसानों ने मीडिया से बातचीत में अपनी नाराजगी व्यक्त की है।
एक यूपी के किसान हरिओम यादव कहते हैं:
“सरकार कर्मचारियों को खुश रखने में लगी है। किसान तो उनके लिए वोट बैंक है। त्यौहार पर हमसे ज्यादा खुशहाल कोई नहीं होना चाहिए, पर हम ही परेशान हैं।”
पंजाब के एक किसान बताते हैं कि कृषि उत्पादों की कीमत बढ़ी नहीं, लेकिन खाद और डीज़ल की बढ़ती कीमत ने उनकी कमर तोड़ दी है।
महाराष्ट्र के एक छोटे किसान की यह बात बेहद चर्चित हो रही है:
“किसान को बोनस मिलना चाहिए या नहीं? सरकार की नजर में शायद किसान को जरूरत नहीं। लेकिन त्यौहार पर बच्चों की खुशी कैसे खरीदें?”
सरकार का पक्ष क्या है?
अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है कि क्यों बोनस किस्त नहीं जारी की गई।
कुछ सरकारी सूत्रों का कहना है कि:
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राज्य सरकारों पर आर्थिक बोझ पहले ही काफी बढ़ चुका है
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बजट में अतिरिक्त प्रावधान की आवश्यकता होगी
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राजस्व लक्ष्यों में कमी के कारण निर्णय टाला गया
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाए बिना आर्थिक विकास नहीं हो सकता।
आर्थिक विश्लेषण: किसानों की परेशानी क्यों बढ़ी?
नीचे कुछ प्रमुख कारण सूचीबद्ध हैं:
| समस्या | मौजूदा स्थिति |
|---|---|
| कृषि लागत में वृद्धि | 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ोतरी |
| इनपुट सामग्री पर सब्सिडी | कई राज्यों में घटाई गई |
| मौसम में अनिश्चितता | फसल नुकसान सामान्य |
| खेती से आय | खर्च के मुकाबले कम |
| बाजार में दाम | स्थिर या घटते हुए |
| MSP पर गारंटी | अब भी अधूरी |
कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसानों का लाभ मार्जिन लगातार कम होता जा रहा है, जिससे ग्रामीण भारत में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
किसानों के समर्थन में राजनीतिक विवाद
विपक्षी दलों ने सरकार पर तीखा हमला किया है। उनका आरोप है कि सरकार केवल कर्मचारियों और उद्योगपतियों के लिए नीतियां बनाती है, जबकि किसान जो कि वास्तविक राष्ट्र निर्माता हैं, उन्हें हमेशा अनदेखा किया जाता है।
कई विपक्षी नेताओं ने कहा:
“देश की 60 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है। फिर भी किसान को बोनस भी न मिले, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।”
आगामी चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बन चुका है।
सड़क से संसद तक गूंज सकती है किसानों की आवाज
किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि दीपावली से पहले राहत की घोषणा नहीं हुई, तो वे बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, धरना और रैली का आयोजन करेंगे।
विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों में इस विषय पर आक्रोश तेजी से बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
भारत के किसान आज न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक उपेक्षा का भी सामना कर रहे हैं।
दीपावली जैसे पवित्र त्यौहार पर बोनस किस्त न मिलना किसानों के लिए भावनात्मक झटका है। जबकि सरकारी कर्मचारियों को लाभ देने का निर्णय यह दिखाता है कि आर्थिक रूप से पहले से सुरक्षित वर्ग को प्राथमिकता दी जा रही है।
किसानों की यह शिकायत सही प्रतीत होती है कि
देश का अन्नदाता अगर आज त्यौहार की खुशियों में पिछड़ जाए, तो भारत की प्रगति कैसे सुनिश्चित होगी?
अब सबकी नजर सरकार की अगली घोषणा पर टिकी है। यदि किसानों की मांग स्वीकार की जाती है, तो यह न केवल उनकी आर्थिक समस्याओं को कम करेगा बल्कि त्योहारी खुशी में भी नई रोशनी जोड़ेगा।
