🗞️ बिहार विधानसभा चुनाव 2025: RJD और कांग्रेस में दरार, गठबंधन पर संकट – जानिए पूरा राजनीतिक विश्लेषण
दिनांक: 20 अक्टूबर 2025
🧩 प्रस्तावना – बिहार की राजनीति में नया भूचाल
बिहार की राजनीति हमेशा से गठबंधन, जातीय समीकरण और नेतृत्व की जंग का मैदान रही है।
2025 के विधानसभा चुनावों ने इस बार फिर उसी परंपरा को जीवित कर दिया है, लेकिन इस बार नज़ारा कुछ अलग है — महागठबंधन (INDIA Bloc) के भीतर ही तनाव और टकराव चरम पर है।
RJD और कांग्रेस — जो सालों से एक-दूसरे के सहयोगी रहे हैं — अब सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन को लेकर सीधी प्रतिस्पर्धा में उतर आए हैं।
यह स्थिति न केवल दोनों दलों के रिश्तों में खटास पैदा कर रही है, बल्कि बिहार की विपक्षी राजनीति की दिशा भी तय कर सकती है।
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🧭 1️⃣ RJD का मास्टरस्ट्रोक – 143 उम्मीदवारों की सूची से बदली सियासी हवा
20 अक्टूबर 2025 की सुबह राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपनी 143 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी।
इस सूची में कुल 24 महिला उम्मीदवार शामिल हैं, जो पार्टी के “महिला सशक्तिकरण” के संदेश को मजबूती देती है।
मुख्य बातें:
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तेजस्वी यादव खुद राघोपुर सीट से मैदान में हैं।
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पार्टी ने लगभग हर क्षेत्रीय समीकरण को साधने की कोशिश की है — यादव, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है।
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RJD ने ये भी संदेश दिया है कि वह गठबंधन में “बड़े भाई” की भूमिका निभाना चाहती है।
यह घोषणा ऐसे समय पर की गई जब कांग्रेस सीटों पर बातचीत जारी रखना चाह रही थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि RJD का यह कदम कांग्रेस पर “मनोवैज्ञानिक दबाव” बनाने के लिए था, ताकि सीटों की सौदेबाज़ी में पार्टी का पलड़ा भारी रहे।
📰 2️⃣ कांग्रेस की जवाबी चाल – पांचवीं सूची जारी, RJD के क्षेत्रों में भी दांव
इसी दिन कांग्रेस ने अपनी पांचवीं सूची जारी की, जिसमें 6 उम्मीदवारों के नाम थे।
सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब कांग्रेस ने कहलgaon सीट से उम्मीदवार प्रवीण कुशवाहा को उतार दिया — जबकि यह सीट परंपरागत रूप से RJD के खाते में मानी जा रही थी।
इससे यह संकेत गया कि कांग्रेस अब सिर्फ साथी नहीं, बल्कि “समान भागीदार” के रूप में अपनी स्थिति चाहती है।
कांग्रेस की रणनीति यह है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर INDIA Bloc का चेहरा बने, इसलिए बिहार में वह खुद को कमजोर दिखाना नहीं चाहती।
कांग्रेस नेताओं ने दावा किया है कि RJD ने पहले तय सीटों का सम्मान नहीं किया, जबकि RJD का तर्क है कि कांग्रेस “अवास्तविक” सीट मांग रही थी।
⚡ 3️⃣ महागठबंधन में दरार – सीट बंटवारे पर तकरार और सार्वजनिक बयानबाज़ी
महागठबंधन की सबसे बड़ी ताकत एकता थी, लेकिन अब वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन रही है।
सीट बंटवारे पर खींचतान इतनी बढ़ गई कि कई सीटों पर दोनों दलों ने अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं।
उदाहरण:
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ललगंज सीट (वैशाली) – RJD और कांग्रेस दोनों ने उम्मीदवार उतारे।
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कहलgaon – कांग्रेस का प्रत्याशी उतरा, जबकि RJD ने इसे पहले अपनी सूची में शामिल किया था।
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अररिया और जहानाबाद – वामदलों के साथ समन्वय नहीं बन पाया।
इस पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अकील अहमद ने कहा,
“हम साझेदारी में हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि RJD एकतरफा फैसले करेगी। अगर सम्मान नहीं मिलेगा, तो कांग्रेस अपने बल पर भी लड़ेगी।”
वहीं RJD के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने पलटवार करते हुए कहा,
“हमने हमेशा गठबंधन की गरिमा रखी है, लेकिन जो पार्टी हर बार पीछे रहती है, उसे आत्ममंथन करना चाहिए।”
💥 4️⃣ अंदरूनी असंतोष – RJD महिला मोर्चा प्रमुख ने किया बगावत का ऐलान
RJD में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
पार्टी की महिला मोर्चा प्रमुख रीतु जायसवाल ने टिकट न मिलने पर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।
उन्होंने कहा —
“मैंने संगठन के लिए वर्षों तक काम किया, लेकिन जब वक्त आया तो वफादारी का इनाम नहीं मिला। अब मैं जनता की उम्मीदवार बनकर मैदान में उतरूंगी।”
यह बयान RJD के अंदर बढ़ती गुटबाज़ी का संकेत देता है।
तेजस्वी यादव के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर कुछ असंतुष्टि स्पष्ट रूप से दिख रही है।
🧠 5️⃣ कांग्रेस में भी उबाल – टिकट बंटवारे पर नेताओं ने लगाए आरोप
कांग्रेस में भी हालात शांत नहीं हैं।
गया जिले की नेता नैना कुमार ने खुलकर आरोप लगाया कि टिकट वितरण में “धांधली” हुई है और कुछ नेताओं ने अपने हितों के लिए योग्य कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया है।
नैना कुमार ने कहा —
“राहुल गांधी को बिहार की हकीकत नहीं बताई जा रही है। राज्य नेतृत्व में व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हैं।”
इस बयान से कांग्रेस के अंदर गहराता असंतोष उजागर होता है।
टिकट बंटवारे के विवाद ने पार्टी की एकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
🔍 6️⃣ मतदाता मनोविज्ञान – जनता गठबंधन नहीं, स्थिरता चाहती है
बिहार का मतदाता भावनाओं से ज़्यादा स्थिरता और रोजगार की राजनीति देखना चाहता है।
2020 में महागठबंधन को उम्मीद थी कि वह सत्ता में लौटेगा, लेकिन जनता ने NDA को दोबारा मौका दिया।
2025 में मतदाता और भी सतर्क हैं — वे अब देखना चाहते हैं कि कौन-सा गठबंधन स्थिर सरकार दे सकता है।
मुख्य मुद्दे:
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बेरोज़गारी और पलायन
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भ्रष्टाचार
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शिक्षा और स्वास्थ्य
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बाढ़ प्रबंधन और कृषि सुधार
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महिलाओं की सुरक्षा और रोजगार
RJD-कांग्रेस की दरार अगर जारी रही, तो मतदाताओं के मन में यह सवाल गूंजेगा कि “क्या ये साथ आकर शासन चला पाएंगे?”
⚙️ 7️⃣ NDA की रणनीति – विपक्ष की दरार को हथियार बनाना
भाजपा और उसके सहयोगी दल इस मौके का भरपूर फायदा उठा रहे हैं।
NDA के प्रचार में अब यह नया नारा गूंज रहा है —
“जो अपने साथियों को नहीं संभाल सके, वो बिहार को क्या संभालेंगे?”
भाजपा की रणनीति दो मोर्चों पर केंद्रित है:
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महागठबंधन की आंतरिक कलह को जनता के बीच प्रचारित करना।
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विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को अपने प्रचार का केंद्र बनाना।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो कई बार राजनीतिक पटल पर अपनी भूमिका बदल चुके हैं, इस बार भाजपा के साथ पूरी तरह खड़े हैं।
वो खुद को “विकास पुरुष” के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं और जनता को स्थिरता का वादा दे रहे हैं।
🏛️ 8️⃣ INDIA Bloc की राष्ट्रीय छवि पर असर
बिहार में RJD और कांग्रेस के बीच की यह टकराहट सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है।
इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर INDIA Bloc (महागठबंधन) पर भी पड़ रहा है।
दिल्ली में बैठकर विपक्षी दल यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि वे 2029 के आम चुनाव के लिए एकजुट हैं,
लेकिन बिहार ने इस एकता की सच्चाई उजागर कर दी है।
अगर बिहार में सीट बंटवारा ही नहीं संभल पा रहा,
तो जनता यह सवाल पूछेगी —
“देश का संचालन मिलजुल कर कैसे होगा?”
📊 9️⃣ सोशल मीडिया युद्ध – डिजिटल प्रचार का नया दौर
तेजस्वी यादव, राहुल गांधी, और भाजपा नेताओं के बीच सोशल मीडिया पर जमकर वार-पलटवार चल रहा है।
X (Twitter), Instagram और YouTube पर वीडियो संदेशों की बाढ़ है।
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RJD ने “Bihar Badlega, Neta Nahi Soch” नामक कैंपेन चलाया है।
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कांग्रेस ने “Bihar Desh Ka Dil Hai” टैगलाइन से प्रचार शुरू किया है।
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वहीं भाजपा ने “Sabka Saath, Sabka Vikas, Sabka Vishwas” का नया बिहार वर्ज़न लॉन्च किया है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर युवाओं का झुकाव इस बार निर्णायक साबित हो सकता है।
📉 10️⃣ निष्कर्ष – बिहार की सियासत निर्णायक मोड़ पर
20 अक्टूबर 2025 की स्थिति में बिहार की राजनीति स्पष्ट रूप से दो भागों में बंटी नज़र आ रही है:
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गठबंधन जो एकजुट दिखना चाहता है, लेकिन भीतर से दरारों में उलझा है।
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विपक्ष जो इन दरारों को अपनी मजबूती में बदलने की तैयारी में है।
RJD और कांग्रेस, दोनों के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है।
तेजस्वी यादव को साबित करना है कि वे “नेता” ही नहीं बल्कि “संगठक” भी हैं।
कांग्रेस को यह दिखाना है कि वह बिहार की राजनीति में अब भी प्रासंगिक है।
अगर दोनों दलों ने आपसी मतभेद भुलाकर जनता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया,
तो गठबंधन को दोबारा उभार मिल सकता है।
लेकिन अगर यह खींचतान जारी रही,
तो जनता उन्हें विपक्ष में भी “अविश्वसनीय साथी” मान सकती है।
✍️ समापन संदेश
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 अब केवल सीटों की लड़ाई नहीं रहा —
यह विश्वास, नेतृत्व और भविष्य की राजनीति का निर्णय बन चुका है।
क्या RJD और कांग्रेस आखिरी वक्त में अपने मतभेद सुलझा पाएंगे?
क्या महागठबंधन 2020 की गलती दोहराएगा या इस बार एकजुट होकर वापसी करेगा?
या फिर NDA इस राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर फिर सत्ता में लौटेगा?
इन सवालों के जवाब अगले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएंगे,
पर एक बात तय है —
👉 बिहार की जनता अब सिर्फ वादे नहीं, विश्वसनीय विकल्प चाहती
